Monday, October 28, 2019

अपनी जड़ों से हमें जोड़ते हैं ये पर्व


भारतीय पर्व कृषि-संस्कृति के प्रतिबिंब हैं। पारिस्थितिकी को रचने के लिए प्रकृति, मनुष्य, पशु, कीट-पतंग, सभी महत्वपूर्ण हैं। गाय तो हमारे समकालीन और पारंपरिक, दोनों अर्थों में मूल्यवान है, इसलिए हमारे एक आराध्य व महानायक कृष्ण उसे चराते हैं। इसका तात्पर्य यह है कृष्ण गाय के माध्यम से समस्त प्रकृति को साधते हैं। उनके द्वारा दही का मटका फोड़़ा जाना, दूध से लेकर घी तक से जुडे़ उनके लोकरंजक प्रसंग यूं ही हमें आह्लादित नहीं करते। उनका एक उंगली पर पर्वत उठाना, यानी पुरुषार्थ का परिचय गोवर्धन से भी जोड़ता है। इंद्र देवता के अभिमान को भी कृष्ण ने तोड़ा, यह लोक की विजय है। कृष्ण इसलिए ही लोकनायक बन गए। आज के दिन गेहूं, चावल, बेसन और पत्तेदार सब्जियों की करी ग्रहण करके गोवर्धन मनाते हैं।
कृष्ण का वनों, खेतों में विचरना भी प्रतीक है, हमारी कृषि संस्कृति का। दुनिया के अधिकांश हिस्सों में आज भी कृषि आजीविका का एक महत्वपूर्ण स्रोत है। इसमें कड़ी मेहनत शामिल है। साथ ही, यह खाद्य सुरक्षा और राष्ट्र के स्वास्थ्य में योगदान देती है। औद्योगिक क्रांति से पहले कृषि अर्थव्यवस्था का मुख्य स्रोत थी। कई वाणिज्यिक विकल्पों के आने के बावजूद अनेक लोग अपनी आय के लिए कृषि पर अब भी निर्भर हैं। कृषि आजीविका का एक प्रकृति-अनुकूल और सबसे शांतिपूर्ण तरीका है। यह मानव जाति के लिए आजीविका का एक विश्वसनीय स्रोत है और आय के ईमानदार स्रोतों में से एक है। कृषि केवल खेती-किसानी तक सीमित नहीं है। गोपालन भी किसी न किसी तरह से कृषि पर निर्भर है। एग्रीकल्चर में कृषि और संस्कृति, दोनों का प्रवेश है।
वेदों के अनुसार, गाय मानव उपयोग के लिए अत्यंत उपयोगी है, इसलिए लोक-समाजों में वह हमारी मां है। गाय के दूध में वसा, कार्बोहाइड्रेट, खनिज और विटामिन बी होता है और यहां तक कि विकिरण के लिए शरीर की प्रतिरोधक क्षमता भी। मस्तिष्क कोशिकाओं को पुनर्जीवित करने के लिए गोघृत (घी) कई विकारों में उपयोगी है। यज्ञ में, यह वायु के ऑक्सीजन स्तर में सुधार करता है। हमारे शास्त्रों में गोमूत्र के कई संदर्भ हैं। यहां तक कि पारसी भी इस प्रथा का पालन करते हैं।
हमारे लोक-समाजों में गाय के गोबर को गोमूत्र के समान मूल्यवान माना जाता है और इसका उपयोग पर्यावरण को शुद्ध करने के लिए किया जाता है, क्योंकि इसमें रेडियम होता है और विकिरण प्रभाव की जांच करता है। यहां तक कि चीन ने डीएनए रक्षक के रूप में डिस्टिलेट को पेटेंट प्रदान किया है। गोमूत्र, नीम और लहसुन को एक कीट विकर्षक के रूप में डब्ल्यूएचओ के जरिए एक वैश्विक पेटेंट प्रदान किया गया है। इसलिए गोवंश का महत्व अब भी बना हुआ है। गोवंश मनुष्य का साथी है, किंतु सबार ऊपरे मानुष सत्य।मनुष्य से श्रेष्ठ  कुछ भी नहीं। मनुष्य की रक्षा सर्वप्रमुख है, गाय और  उसके वंशज संसार की बेहतरी में सहयोग देते हैं। भारतीय परिवारों में गाय को धौरी, उजरी इत्यादि घरेेलू संज्ञाओं से बुलाते हैं, इससे उनके साथ हमारे मातृवत रिश्ते का पता चलता है। अन्नकूट का सीधा संबंध गाय से है। अन्न कृषि उत्पाद है।
भाई दूज (भ्रातृ द्वितीया) कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को मनाया जाने वाला पर्व है, जिसे यम द्वितीया भी कहते हैं। भाई दूज दीपावली के दो दिन बाद आने वाला ऐसा पर्व है, जो भाई के प्रति बहन के स्नेह को अभिव्यक्त करता है और  बहनें अपने भाई की प्रसन्नता के लिए कामना करती हैं। पीवी काणे के अनुसार, भ्रातृ द्वितीया का उत्सव एक स्वतंत्र कृत्य है, किंतु यह दिवाली के तीन दिनों में संभवत: इसीलिए मिला लिया गया कि इसमें बड़ी प्रसन्नता और आह्लाद का अवसर मिलता है, जो दिवाली की खुशियों को विस्तार दे देता है। भाई दरिद्र हो सकता है, बहन अपने पति के घर में संपत्ति वाली हो सकती है। वर्षों से भेंट नहीं हो सकी है, आदि-आदि कारणों से द्रवीभूत होकर हमारे प्राचीन लेखकों ने इस उत्सव की परिकल्पना कर डाली है। भाई-बहन एक-दूसरे से मिलते हैं, बचपन के सुख-दुख की याद करते हैं। भाई और बहन एक-दूसरे के प्रति परंपरागत तरीके से स्नेह प्रकट करते हैं। जहां बहनें अपने भाइयों की तरक्की और खुशहाली की कामना करती हैं, तो वहीं भाई अपनी बहन की संवेदना को प्ल्विवत करने और उसकी उन्नति की रक्षा का संकल्प लेते हैं। इसमें सांस्कृतिकता का रंग भी स्वत: समाहित है। भैया दूज के अगले दिन गोधन के गोबर से शहरी से लेकर ग्रामीण क्षेत्रों तक बहनें दीवार पर पिड़िया बनाकर एक माह तक उसकी पूजा करती हैं और अपने भाई की दीर्घायु की कामना करती हैं। इसे पूर्वी भारत के अनेक क्षेत्रों में स्त्रियों के सांस्कृतिक प्रशिक्षण और आनंद का महत्वपूर्ण अवसर माना जा सकता है। महीने भर बाद सज-धजकर गीतों के साथ पिड़िया को आस-पास के तालाब या नदी में प्रवाहित कर दिया जाता है।
चित्रगुप्त के विषय में तो स्वामी विवेकानंद ने कहा है कि वह उनकी परंपरा से आते हैं। आधुनिक विज्ञान ने भी यह सिद्ध किया है कि हमारे मन में जो भी विचार आते हैं, वे सब चित्र-रूप में होते हैं। मान्यता के अनुसार एक व्याख्या यह भी है कि भगवान चित्रगुप्त इन सभी विचारों के चित्रों को गुप्त रूप से संचित करके रखते हैं, अंत समय में ये सभी चित्र दृष्टिपटल पर रखे जाते हैं। चित्रगुप्त जी की पूजा के पीछे उनका मेधा संपन्न होना और न्याय व लेखा को पारदर्शी बनाना है। कुल मिलाकर, दीपावली से जो पर्व-वृत्त बनता है, वह बताता है कि भारतीय जन व समाज केवल मनुष्य केंद्रित नहीं हैं। वे समस्त पारिस्थितिकी और प्रकृति के प्रति संवेदनशील हैं। मनुष्य अपने तक नहीं, मनुष्यता को दिगंत तक पंछी पखेरू, बछरू, पेड़-पात तक विस्तार देता है। उनमें पवित्रता ढूंढ़ लेता है। सबकी प्रगति की कामना करता है। यही मांगल्य का ध्येय भी है।